हिंदी सिनेमा के गीतों को भोजपुरी और पूर्वांचली भाषा की ख़ुशबू से महकाने वाले गीतकार अंजान सही मायनो में इंसानी एहसासों के ख़ास जानकार थे। गीतों में उनके अल्फ़ाज़ की जादूगरी ऐसी थी कि लोगों के दिल में वो हुकूमत कायम कर लेते। बनारस के रहने वाले लाल जी पांडे यानी अंजान का गीतकार बनने का सफ़र ज़िंदगी के बहुत ही पेचीदा मोड़ से होकर गुज़रा है। एक बार की बात है गायक मुकेश बनारस आए हुए थे। मुकेश वहां के मशहूर क्लार्क होटल में ठहरे थे। होटल के मालिक ने उनसे गुज़ारिश की कि वह एक दफ़ा अंजान की कविता सुन लें। मुकेश ने जब कविता सुनी तो वह काफ़ी प्रभावित हुए। उन्होंने अंजान को फ़िल्मों में गीत लिखने की सलाह दी।
हालांकि, उस वक़्त अस्थमा के रोग की से जूझ रहे अंजान ने मुकेश की सलाह पर अमल नहीं किया। लेकिन, बीमारी की वजह से आखिर उन्हें बनारस के पुरसुकून और ख़ुशगावर माहौल को छोड़कर मुंबई का रुख करना पड़ा। अंजान के बेटे गीतकार समीर ने मीडिया को दिए एक इंटरव्यू में बताया था कि पापा से डॉक्टरों ने कहा कि अगर ज़िंदा रहना है तो आपको यह शहर छोड़ना होगा। अस्थमा बहुत बढ़ गया था और उन्हें काफ़ी तकलीफ़ देने लगा था। डॉक्टरों ने मशविरा दिया कि अगर किसी सागर के तट पर जाएंगे, तभी अस्थमा कंट्रोल हो पाएगा। ड्राइ क्लाइमेट में रहेंगें तो बचने की संभावना बहुत कम रहेगी।
24 अक्टूबर 1929 को बनारस में पैदा हुए अंजान ने बीएचयू से बी.कॉम की पढ़ाई की। लेकिन बीमारी और बेहतर आबो-हवा की ख़ातिर वो 1953 में मुंबई आ गए। ज़िंदगी को दोबारा शुरू करने के लिए यहां आकर उन्होंने मुकेश से मुलाक़ात की। जिसके बाद मुकेश ने उन्हें निर्देशक प्रेमनाथ से मिलवाया, जो अपनी फ़िल्म के लिए किसी गीतकार की तलाश में थे। अंजान ने प्रेमनाथ की प्रिजनर ऑफ गोलकोंडा के लिए गाने लिखे। लेकिन गाने मक़बूल नहीं हुए। पहली फ़िल्म मिलने के बाद भी शोहरत उन्हें काफ़ी बाद में जाकर मिली। समीर बताते हैं कि सफ़लता की सारी ऊंचाईयों पर उन्हें डॉन ने पहुंचाया था।
अंजान ने वैसे तो अपने समय के सभी दिग्गज संगीतकारों के साथ काम किया, लेकिन कल्याणजी-आनंदजी के साथ उनकी जोड़ी कमाल की रही। अंजान का अमिताभ बच्चन से एक ख़ास रिश्ता बन गया था। उन्होंने अमिताभ की कई फ़िल्मों के लिए गाने लिखे। जिनमें डॉन, मुकद्दर का सिकंदर, याराना, नमक हलाल और शराबी उनके करियर में मील का पत्थर रहीं। क़लम के फ़न से सितारों की जगमगाती दुनिया में अंजान ने अपना एक ऐसा मुक़ाम बनाया, जिसकी ताज़गी आज भी महसूस की जा सकती है। अंजान के लिखे यादगार गीतों में, 'ओ खाइके पान बनारस वाला, खुल जाए बंद अकल का ताला..., इंतहा हो गई इंतज़ार की, आई ना कुछ खब़र, मेरे यार की..., गोरी हैं कलाईयां तू ला दे मुझे हरी हरी चूड़ियां..., मुझे नौ लखा मंगा दे रे ओ सैया दीवाने, तेरे जैसा यार कहां, कहां ऐसा याराना...,छू कर, मेरे मन को, किया तूने, क्या इशारा..., मेरे अंगने में तुम्हारा क्या काम है..., जैसे बेहतरीन गीत हैं।
हिंदी सिनेमा को एक से एक नायाब गीत देने वाले इस गीतकार को अपने कुछ गीतों पर एतराज़ भी रहा। समीर कहते हैं, 'जब पापा ने डिस्को डांसर के गाने लिखे तो उन्होंने मुझसे कहा कि ऐसा लग रहा जैसे मैं अपने क़लम के साथ दुष्कर्म कर रहा हूं। लोग ये कैसे-कैसे गाने लिखवा रहे हैं। अंजान को एक बात का और भी रंज रहा कि कई सदाबहार नग़मे लिखने के बावजूद उन्हें फ़िल्म फेयर का अवॉर्ड नहीं दिया गया। सिनेमा को क्षेत्रियों बोलियों की महक से रू-बू-रू कराने वाले अज़ीम फ़नकार अंजान आख़िर इस दुनिया से 13 सितंबर 1997 को कूच कर गए। गीतों के रूप में उनका बेशक़ीमती ख़ज़ाना आज भी लोगों की ज़बान पर है।
9 वर्ष पहले
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