मैं श्रीनगर में पैदा हुआ। बहुत कम उम्र में ही मुझमें कविता के प्रति रुचि पैदा हो गई थी। लेकिन शुरुआत में मैं अपनी कविताएं किसी को दिखाने या उन्हें प्रकाशित करवाने के मामले में बेहद संकोची था। मेरी अनेक कविताएं तो इस कारण भी नष्ट हो गईं, क्योंकि वे सिगरेट के पैकेट पर लिखी गई थीं। लेकिन कम छपने का मुझे कोई मलाल नहीं है। एक पीढ़ी पहले तक कश्मीरी के कवि प्रकृति और प्रेम पर ही लिखते थे। मैंने जब लेखन शुरू किया था, तब कश्मीर अशांत था। मैंने ठोस यथार्थ को अपनी कविताओं का विषय बनाया। इस मामले में महजूर और आजाद जैसे वरिष्ठ कवियों से मुझे बहुत कुछ सीखने को मिला।
शेख अब्दुल्ला के स्वागत में एक जनसभा में पढ़ी गई एक कविता से अचानक मैं मशहूर हो गया। जब मुझे सोवियत लैंड नेहरू पुरस्कार देने का फैसला हुआ, तब तक मेरे पास एक भी किताब नहीं थी। तब आयोजकों को मजबूरन यह घोषित करना पड़ा कि मुझे यह पुरस्कार किसी किताब पर नहीं, बल्कि मेरी समग्र रचनाओं पर दिया जा रहा है। मैंने कश्मीर में प्रगतिशील लेखकों को एकजुट करने का काम किया, क्योंकि मुझे यह बेहद जरूरी काम लगा। हरिवंश राय बच्चन ने मेरी कुछ कविताओं का अनुवाद किया है, जबकि कमलेश्वर मुझे कश्मीरी साहित्य के देवदार कह चुके हैं। लेकिन मुझे सबसे ज्यादा खुशी मिलती है, जब मंच पर कविता पढ़ते समय दर्शक हाथ उठा-उठाकर मेरा स्वागत करते हैं। मेरे हिसाब से वही साहित्य महत्वपूर्ण है, जो समाज की बेहतरी के लिए काम करता है।
-कश्मीर के चर्चित कवि
7 महीने पहले
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