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‘सुमन’ में जया को देखा तो कुछ ऐसा लगा : शबाना आज़मी

शबाना आजमी
                
                                                         
                            कॉलेज के दिनों में हम लोग थियेटर करते थे। खर्च फारूख शेख की जेब से जाता था। उस दौरान फिल्म इंस्टीट्यूट की कुछ डिप्लोमा फिल्में देखा करती थी। उन्हीं दिनों एक फिल्म देखी- ‘सुमन’, जया भादुड़ी की फिल्म थी। उस फिल्म को देखकर मैं बहुत प्रभावित हुई और उस दिन से मेरी दुनिया बदल गई।
                                                                 
                            
 
जिस माहौल में मेरी परवरिश हुई, उसमें दो बहुत ही बड़े लोगों का प्रभाव मेरे ऊपर था। एक मेरे वालिद कैफी आजमी, जो एक जाने-माने कवि थे और सामाजिक कार्यकर्ता भी थे और मेरी वालिदा शौकत आजमी,  जो पृथ्वी थियेटर में काम करती थीं। मेरी मां मुझे अक्सर अपने साथ टूर पर लेकर जाती थीं। पृथ्वीराज कपूर ने मेरे लिए कुछ कॉस्ट्यूम बनवा दिए थे और जब कोई भी ग्रुप सीक्वेंस या कुछ होता था, तो मुझे उसमें डाल दिया जाता था।

दूसरी तरफ, मेरे वालिद कैफी साहब कॉम्युनिस्ट पार्टी के सदस्य थे और मजदूर किसानों के साथ काम करते थे, तो उनके साथ मैं भी जाती थी और सारे कार्यकर्ता मुझे कंधों पर बैठाकर घूमते थे। इन दोनों का ही बहुत मजबूत प्रभाव मुझ पर था। हम रहते भी एक ऐसी जगह थे, जहां आठ परिवार एक साथ रहते थे। एक कमरे में सरदार जाफरी रहा करते थे, एक कमरे में हमारा परिवार था। वहीं अन्य कमरों में पार्टी के बाकी लोग। पारिवारिक माहौल से काफी कुछ हमने सीखा। फिर एक वक्त आया जब मुझे करियर चुनना था, तो मैंने अपनी वालिदा का करियर चुना और उसके बाद अपने वालिद की तरह सामाजिक कार्यकर्ता भी हूं। 

...नाटकों में हमेशा लड़कों का रोल ही करती थी

मैं जब स्कूल में थी, तो हमेशा नाटकों में हिस्सा लेती थी, पर हमेशा लड़कों का रोल ही करती थी। फिर जब सेंट जेवियर्स कॉलेज में पढ़ने गई, तो वहां कोई हिंदी थियेटर ग्रुप नहीं था। फिर मैंने और फारूख शेख, जो मुझसे दो साल सीनियर थे, ने मिलकर 'हिंदी नाट्य मंच' बनाया। इसके प्रेसिडेंट वह थे और जनरल सेक्रेटरी मैं थी। हमें कॉलेज से थियेटर चलाने के लिए एक भी 

पैसा नहीं मिलता था। सारा पैसा फारूख की जेब से जाता था और जब कभी प्ले में फर्नीचर की जरूरत पड़ती, तो मैं अपनी एक दोस्त के घर से फर्नीचर मंगवाती थी। हमें हमेशा वाहवाही मिलती थी। हमें बेस्ट प्ले, बेस्ट एक्टर और बेस्ट एक्ट्रेस का अवॉर्ड मिलता था। सही मायनों में मेरी दिलचस्पी वहीं से हुई।

उस दौरान मैंने फिल्म इंस्टीट्यूट की कुछ डिप्लोमा फिल्में देखीं। उनमें जया भादुड़ी की एक फिल्म थी 'सुमन'। उस फिल्म को देखकर मैं बहुत प्रभावित हुई। मैंने सोचा कि मुझे भी ऐसा ही काम करना है। 
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...नाटकों में हमेशा लड़कों का रोल ही करती थी

8 वर्ष पहले

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