प्रसिद्ध साहित्यकार रवींद्र कालिया ने अपने जीवन के संस्मरण में कई रोचक किस्सों का वर्णन किया है। उनके जीवन के अनछुए पहलुओं को उजागर करने वाले एक संस्मरण में वह अपने मुंबई में बिताए जीवन का संजीदगी से उल्लेख करते हैं। एक वाकये का जिक्र करते हुए वह लिखते हैं कि मझे एक दिन धर्मवीर भारती के धर्मयुग में काम करने का एक पत्र मिला। मेरे पास मुंबई जाने का किराया भी नहीं था। उन दिनों ममता से मेरी देखा-देखी चल रही थी। दिल्ली में ममता मुझसे दुगुना वेतन पाती थी, मगर थीं महाकंजूस। मगर जल्द ही वह मेरे रंग में रंगने लगी। ममता से लगभग दुगुने वेतन पर 'धर्मयुग' में मेरी नियुक्ति हुई थी तो उससे कम वेतन पाने की कुंठा भी समाप्त हो गई। एक अच्छी प्रेमिका की तरह ममता ने न केवल मेरी गाड़ी का आरक्षण करवाया बल्कि मुंबई के जेब खर्च की भी व्यवस्था कर दी। तब से आज तक मेरी वित्त व्यवस्था उसी के जिम्मे है। वह मेरी वित्तमंत्री है।
मुंबई में दादर स्टेशन पर मेरे मित्र पंजाबी कवि स्वर्ण को मुझे लेने आना था, मगर वह समय पर नहीं पहुंचा। जब देर तक स्वर्ण का नामो निशान दिखाई न दिया तो मैंने कालबादेवी के लिए टैक्सी की। टैक्सी वाले ने भी ख़ूब मज़ा चखाया। कालबादेवी में एक गेस्ट हाउस में हरीश तिवारी रहता था, वह 'माधुरी' में काम करता था। किसी तरह उसकी लॉज तक पहुंचा और मालूम हुआ हरीश दो दिन से लॉज में ही नहीं आया। लॉज का मालिक अच्छा आदमी था, उसने मेरी मजबूरी समझकर रात काटने के लिए गोदाम में खटिया डलवा दी।
मुंबई में जितने आकस्मिक रूप से नौकरी मिली थी, उससे भी अधिक आकस्मिक रूप से शिवाजी पार्क सी फेस में फ्लैट मिल गया। स्वर्ण का ही एक दोस्त था एस.एस. ओबेराय। वह एक भुतहा फ्लैट में अकेला रहता था और उसे किसी साथी की तलाश थी, किसी पंजाबी साथी की, जबकि उसकी टाइपिस्ट और सेक्रेटरी और प्रेमिका सुनंदा महाराष्ट्रीयन थी।
ओबेराय, जिसे सुनंदा ओबी कहती थी, विचित्र इंसान था। वह न बस में दफ्तर जाता था न ट्रेन में। हमेशा टैक्सी में चलता था, उसके लिए चाहे उसे पान वाले से उधार क्यों न लेना पड़ा। ओबी के निधन पर मैंने उस पर एक लंबा संस्मरण लिखा था। वह सुबह नौ बजे सूट-बूट से लैस होकर एख बिज़नेस टाइकून की तरह लेमिंग्टन रोड पर अपने दफ्तर के लिए निकलता था। उसकी जेब में जितना पैसा होता शाम को लौटते हुए सब खर्च कर डालता। थोक में सामान ख़रीद लाता, शाम को वह दो-एक पेग उत्तम व्हि्स्की के भी पीता। उसके बाद किचन में घुस जाता और नौकर के साथ मिलकर मांसाहारी व्यंजन तैयार करता। वह मेरे ऊपर जितना खर्च करता उससे मुझे लगता कि पूरी तनख़्वाह भी उसे सौंप दूं तो कम होगी।
जब भी उसके पास कुछ पैसे जमा होते, वह पार्टी थ्रो कर देता। उसकी पार्टियां भी यादगार होतीं, उसमें मुंबई के बड़े-बड़े उद्योगपति, बिल्डर, मॉडल, एयर होस्टेस और फ़िल्मी हस्तियां शामिल होतीं उसके ये संपर्क कब विकसित हो जाते थे, मुझे पता ही नहीं चलता था। कल तक उसने सुनील दत्त का ज़िक्र भी नहीं किया होता और शाम को अचानक पता चलता शाम को सुनील दत्त और नर्गिस आने वाले हैं। बाद में जब मैं एक बार इलाहाबाद से मुंबई गया तो पाया शरद जोशी का उनके यहां दिन रात उठना-बैठना था। दोनों दो ध्रुव थे। इस प्रकार के झटके ओबी के साथ रहने पर अक्सर मिला करते थे।
(रवींद्र कालिया की किताब गालिब छुटी शराब का अंश)
4 वर्ष पहले
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