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घर में रहते हुए भी कोई कवि निर्वासन झेल सकता है !

घर में रहते हुए भी कोई कवि निर्वासन झेल सकता है !
                
                                                         
                            ईमान मर्सल -मिस्र की मशहूर अरबी कवयित्री हैं, वे लिखती हैं- कुछ लोग कविता को विरोध की आवाज कहते हैं। यह ऐसी बात है, जिससे मैं अपने अब तक के जीवन में जुड़ाव नहीं महसूस कर पाती। शायद ऐसा उस संस्कृति के कारण है, जहां से मैं आती हूं। 
                                                                 
                            

औपनिवेशिक युग की समाप्ति के बाद बहुत बड़े राजनीतिक सवाल खड़े हुए थे, उन पर बेहद बौद्धिक-विचारधारात्मक बहसें चलीं, और उसके बाद अरब साहित्यिक पटल पर फलीस्तीनी त्रासदी ने बहुत बड़ी जगह घेर ली। उस दौर से महान कवि निकलकर आए, जैसे कि महमूद दरवेश, फिर भी मेरा मानना है कि उनकी कविता में काव्यशास्त्र का जो सुंदर प्रयोग है, वह प्रतिवाद या विरोध के इस तत्व से पूर्णतः स्वतंत्र है। 

प्रामाणिक कला, अपनी शैक्षणिक भूमिका अदा करती हुई एक अप्रत्यक्ष राजनीतिक धारा हो सकती है। जैसा कि बादू ने कहा है, कला शैक्षणिक होती है, क्योंकि यह  सत्य का संधान करती है और शिक्षा भी इससे अलग कुछ नहीं करती : यानी ज्ञान की विभिन्न विधाओं का संयोजन इस तरह करना कि सत्य उसमें एक छोटा-सा छेद कर सके।
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7 वर्ष पहले

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