नया दौर, मुग़ले आज़म, आन, दाग़, अंदाज़, संगदिल जैसी अनेक बेहतरीन फ़िल्मों में अपनी अदाकारी का लोहा मनवा चुके दिलीप कुमार परफेक्शन को हमेशा तरजीह देते थे। यही वजह है कि चुनिंदा फ़िल्में करने के बावजूद आज भी उनकी अदाकारी का अपना अलग मुक़ाम है। उनकी हर फ़िल्म में अदाकारी एक अलग ही मेयार होता था। लेकिन यह मेयार ऐसे ही हासिल नहीं हुए बल्कि उन्होंने इसके लिए ख़ुद को काफी तराशा है। इसकी एक बानगी दिलीप कुमार की हिट फ़िल्म 'कोहिनूर' के एक गाने के लिए की गई मेहनत से भी नज़र आती है। जिसमें उनकी उंगलियां ज़ख्मी हो गई थीं।
'कोहिनूर' फ़िल्म के गीतों को नौशाद ने अपने संगीत से सजाया था। नौशाद हिंदी सिनेमा के ऐसे संगीतकार है जिन्होंने संगीत को नए क्षितिज से रू-ब-रू करवाया। चौधरी ज़िया इमाम ने अपनी किताब 'नौशाद ज़र्रा जो बना आफ़ताब' में 'कोहिनूर फ़िल्म के 'मधुबन में राधिका नाचे रे' गीत से जुड़े इस क़िस्सा का ज़िक्र किया है। ज़िया इमाम लिखते हैं, 'इस गाने के लिए कई बड़े से लेकर छोटे चीनी के प्यालों का प्रयोग किया था। एक छड़े से सारे प्यालों पर हल्के से मारने पर बहुत प्यारी जलतरंगें निकलती थीं। इसी गाने के लिए ही नौशाद साहब ने दिलीप कुमार को सितार बजाना सिखाया, क्योंकि वे चाहते थे कि फ़िल्म में ऐसा लगे कि वाक़ई सितार बज रहा है।'
इस गीत के सितार बजाने वाले सीन में परफेक्शन लाने के लिए नौशाद ने कोई कोताही नहीं बरती। ज़िया इमाम लिखते हैं कि इसके लिए दिलीप कुमार को उन्होंने कई महीने प्रैक्टिस करवाई। जिसके चलते दिलीप कुमार की उंगलियां ज़ख्मी हो गई थीं, मगर इस गाने ने फ़िल्म में जान फूंक दी थी।
'कोहिनूर का 'मधुबन में राधिका नाचे रे' गीत...
9 वर्ष पहले
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