ज़िंदगी एक ऐसी किताब है, जिसके हर सफ़े पर मुख़्तलिफ़ पल बिखरे होते हैं। ये पल सुख-दुख, ग़म-ख़ुशी, हंसना-रोना, पाना-खोना, जैसे अहसासों को समेटकर एक मुकम्मल वक़्त की तामीर करते हैं। फ़र्क बस इतना है कि ज़िंदगी की इस किताब को कोई दिल से पढ़ रहा है, तो कोई महज पढ़ने की कोशिश कर रहा है और इसी किताब में एक सफ़ा है मोहब्बत का। मोहब्बत का अहसास सारे अहसासों से जुदा होता है। जितना सुकून ये देता है, उतना दर्द भी छोड़ जाता है। मोहब्बत में जुदाई का दर्द सौ जन्मों के किसी और दर्द से ज़्यादा बड़ा होता है। ये दर्द जब उठता है, तो ज़िंदगी कराहती है, चीख़ती है, चिल्लाती है। दुआ मांगती है कि कहीं तो इस ग़म का इलाज हो, कोई तो महबूब तक दिल की बात पहुंचा दे।
कुछ ऐसा ही दर्द समेटे हुए है 1966 में आई फिल्म अनुपमा का गीत 'या दिल की सुनो दुनिया वालों या मुझको अभी चुप रहने दो'। मशहूर शायर क़़ैफ़ी आज़मी के लिखे इस गीत को हेमंत कुमार ने अपनी रूहानी आवाज़ से सजाया है। अभिनेता धर्मेंद्र पर फ़िल्माये गए इस गीत में क़ैफ़ी आज़मी साहब ने इश्क़ में जुदाई के ग़म और मजबूरी को बख़ूबी बयां किया है। मोहब्बत तो प्रेमी ने की है, लेकिन ख़ुदग़र्ज़ दुनिया के आगे वो बेबस है, अपने महबूब के आगे वो बेबस है।
'या दिल की सुनो दुनियावालों
या मुझको अभी चुप रहने दो
मैं ग़म को खुशी कैसे कह दूं
जो कहते हैं उनको कहने दो'
यहां क़ैफ़ी साहब ने एक टूटे हुए दिल की आह को लफ़्ज़ों में समेटा है। दुख में दुनिया कई तरह की नसीहत देती है, लेकिन किसी भी तरह की नसीहत को आत्मसार करने के लिए प्रेमी तैयार नहीं है। वो अपने ग़म में इतना डूब चुका है कि न तो अपने जज़्बातों को बयां कर सकता है और न ही किसी के जज़्बातों को समझने की ताक़त उसमें बची है।
'ये फूल चमन में कैसा खिला
माली की नज़र मे प्यार नहीं
हंसते हुए क्या-क्या देख लिया
अब बहते हैं आंसू बहने दो
या दिल की सुनो...'
जिस तरह रात के बाद सहर (सुबह) होती है, उसी तरह ख़ुशी के बाद ग़म का अहसास होता है। यहां क़ैफ़ी साहब फूल और माली की नज़ीर देते हुए लिखते हैं कि ऐसी मोहब्बत क्यों की, जिसकी महबूब को क़दर ही नहीं और जब मोहब्बत हो ही गई, तो रंज कैसा। प्यार के दौर का अंजाम जब ग़म ही है, तो निकलते हुए आंसुओं पर क्या पछताना। अब इश्क़ जो कुछ भी दे दे उसे क़ुबूल कर लो।
'एक ख़्वाब ख़ुशी का देखा नहीं
देखा जो कभी तो भूल गये
माना हम तुम्हें कुछ दे ना सके
जो तुमने दिया वो सहने दो
या दिल की सुनो ...'
इन पंक्तियों में ख़ुद को हिकारत की नजर से देखते हुए लिखते हैं कि इस ग़म भरी ज़िंदगी को किसी भी तरह की ख़ुशी की ख़्वाहिश नहीं करनी चाहिए, किसी भी तरह की मोहब्बत की तमन्ना नहीं पालनी चाहिए। किसी से कोई उम्मीद नहीं करनी चाहिए। अगर महबूब नहीं, तो जीवन में कोई ख़ुशी नहीं। महबूब को भले ही उसने मोहब्बत के सिवा कुछ न दिया हो, पर जो दर्द महबूब ने जुदाई और बेरुखी का दिया है, उसे लेकर साथ जीना होगा।
'क्या दर्द किसी का लेगा कोई
इतना तो किसी में दर्द नहीं
बहते हुए आंसू और बहें
अब ऐसी तसल्ली रहने दो
या दिल की सुनो...'
इन पंक्तियों में क़ैफ़ी साहब महबूब पर तंज़ करते हुए लिखते हैं कि ये दुनिया बड़ी ख़ुदगर्ज़ है। दर्द बांटने से कम होता है, लेकिन महबूब में ऐसी कोई भी उम्मीद नहीं दिखती। उसे प्रेमी के दर्द का कतई अहसास नहीं और दुख में तसल्ली भी वहीं इंसान दे रहा है, जिसने खुद दुख दिया। गीत में मोहब्बत, रंज-ओ-ग़म शिदद्त से महसूस किया जा सकता है, जिसकी वजह से यह गीत मेरे लिए बहुत अज़ीज़ है। इस गीत से टूटे हुए दिल की आवाज़ आती है।
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