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remembrance of likhe jo khat tujhe song

मेरे अज़ीज़ फिल्मी नग़मे

लिखे जो ख़त तुझे, वो तेरी याद में...सुनहरे इश्क़ का गाढ़ा रंग और हसीन यादें

मोहम्‍मद अकरम, नई दिल्ली

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इश्क़ की हसीन यादें ज़िंदगी का वो सरमाया होतीं हैं, जब दुनिया अजनबी मालूम होती है। उस वक़्त महबूब इन यादों की पनाह में ख़ुद को महफूज़ पाता है। महबूब को ख़त लिखकर अपने दिल के भावों को लफ़्ज़ों में उतारना भी इश्क़ ही है। महबूब एक दिन ना दिखे तो सच्चे प्यार में आंखे तरस जाती हैं। महबूब कहीं चले जाए तो उसकी याद में दुनिया अजनबी लगती है। ऐसे में ख़त लिखकर महबूब के क़रीब आया जा सकता है।

ख़त एक तरह से इश्क़ के बेशक़ीमती लम्हों को दोबारा से जीने की चाहत होती है। सच्चा महबूब प्रेम में बेहतरीन ख़त लिखकर अज़ीज़ को यह बताता है कि तुम हमेशा मेरे कितने क़रीब हो। ख़त को समोया हुए एक गाना है जो अक्सर मुझे माज़ी (भूतकाल) से फौरन जोड़ देता है। यह गीत मुझे प्रिय है। 1968 में रिलीज़ कन्यादान फ़िल्म का गाना, 'लिखे जो ख़त तुझे, वो तेरी याद में...' मुझे अज़ीज़ है।

शशि कपूर और आशा पारेख पर फ़िल्माया गया यह बेहद प्यारा नग़मा गीतकार गोपालदास नीरज की क़लम से निकला है।  मोहम्मद रफ़ी ने इसे दिलकश आवाज़ दी है। वहीं, संगीतकार शंकर-जयकिशन ने अपने संगीत से इस गीत के बोलों को अमर कर दिया है।

'लिखे जो ख़त तुझे
वो तेरी याद में
हज़ारों रंग के 
नज़ारे बन गए'

'सवेरा जब हुआ
तो फूल बन गए
जो रात आई तो
सितारे बन गए'

इस गाने की सबसे ज़्यादा दिल को छूने वाली इन पंक्तियों में एक आशिक़ अपनी माशूक़ से मुलाक़ात के बाद अपने दिल की कैफ़ियत बयां करता है। वो, उसे बताता है कि जब तुम नहीं थीं तो मैंने तुम्हारी याद में ख़त लिखे हैं। मैंने इन्हीं ख़तों के सहारे तुमसे अलग रहने के तक्लीफ़ को बर्दाश्त किया है। 


'कोई नग़मा कहीं गूंजा
कहा दिल ने के तू आई
कहीं चटकी कली कोई 
मैं ये समझा तू शरमाई
कोई ख़ुशबू कहीं बिख़री 
लगा ये ज़ुल्फ़ लहराई'

अक्सर, मोहब्बत में ऐसी हालत हो जाती है जब महबूब के न होने पर भी उसके होने का एहसास हमारे ज़हन में हर वक़्त रहता है। इस अंतरे में उसी एहसास को बख़ूबी बयां किया गया है। जब इस गीत को कोई आशिक़ सुनता है तो उसके दिल को लगता है कि उसका महबूब मौजूद है। इस गीत के बोल इतने मधुर हैं कि कोई भी इसकी रूमानियत में भर जाएगा।  

'फ़िज़ा रंगीं अदा रंगीं 
ये इठलाना ये शर्माना
ये अंगड़ाई ये तनहाई 
ये तरसा कर चले जाना
बना दे न कहीं मुझको 
जवां जादू ये दीवाना'
 
इन पंक्तियों में नीरज ने एक ख़ूबसूरत माहौल का ज़िक्र किया है। जहां, प्रेमिका इठला और शर्मा रही है। लेकिन, वो उसके क़रीब न आकर दूर चली जाती है। प्रेमी का मन इससे उदास हो जाता है। वैसे भी इश्क़ में दूरियां सदियों की तरह लगती हैं।


'जहां तू है वहां मैं हूं 
मेरे दिल की तू धड़कन है
मुसाफ़िर मैं तू मंज़िल है 
मैं प्यासा हूं तू सावन है
मेरी दुनिया ये नज़रें हैं 
मेरी जन्नत ये दामन है'

ये लाइनें सीधे महबूब से मुख़ातिब करती हैं। इनमें आशिक़ अपनी माशूक को ज़िंदगी का हमसफ़र क़बूल कर रहा है। वो, ख़ुद को मुसाफ़िर और माशूक़ को मंज़िल बता रहा है। साथ ही वो इस बात का भी इज़हार करता है कि मेरी ख़ूबसूरत दुनिया के नज़ारे तुम्हारे इर्द-गिर्द हैं। जिनसे मैं कभी अलग नहीं होना चाहता। मेरी जन्नत तुमसे है और मैं तुम्‍हारे बिना इसकी कल्पना भी नहीं करता। आशिक़ अपने महबूब से कहता है मेरी जन्नत तुम्‍हारा दामन है। 

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