गीतकार बसंत देव का गीत 'मन क्यूं बहका रे बहका आधी रात को' मध्य रात्रि के न जाने कितने सहचरों को 'गान' दे गया। इस गीत को 1984 में रिलीज फ़िल्म 'उत्सव' में लता मंगेशकर और आशा भोंसले ने मिलकर गाया है। लक्ष्मीकांत- प्यारेलाल के संगीत ने इस गाने को अपने सुरों से सजाया है। गीत को रेखा और अनुराधा पटेल पर फ़िल्माया गया है।
मध्य रात्रि का समय हो और आंखों में नींद न हो तो समझ जाना चाहिए कि आप प्रेम में हैं...कुछ ऐसे ही भावों को ये गीत लिए हुए है। जिसमें रात के पहर के कुछ विशेषण गिनवाए जा रहे हैं। यह गीत सुनते वक्त लगता है मानो एक नायिका प्रश्न करके अपने मन की शंकाएं दूर कर रही है और दूसरी नायिका उसके उत्तर दे रही है। इसके ये संवाद अत्यंत सुखद लगते हैं इसलिए यह नग़मा मेरा अज़ीज़ है।
रेखा को अनुराधा आभूषणों से तैयार कर रही हैं, रेखा किंचित मन में किसी सुखद भाव की आमद लिए पूछ रही हैं कि...
मन क्यों बहका रे बहका आधी रात को
और अनुराधा ख़यालों में खोई मानो इसका जवाब ढूंढ़ रही हैं और त्वरित जवाब देते हुए कहती हैं कि
बेला महका रे महका आधी रात को
और इस तरह तरन्नुम में यह संवाद शुरू हो जाता है।
इसके बाद फिर एक नए प्रश्न के साथ रेखा पूछती हैं कि...
किसने बँसी बजाई आधी रात को
और इसके बाद जिस भाव के साथ अनुराधा कहती हैं कि...
जिसने पलकें हो, जिसने पलकें चुराई आधी रात को
लगता है कि उन्हें अचानक ही इसका जवाब याद आ गया। इस उत्तर पर रेखा का लजाना उनके मनोभावों को दर्शाता है।
अगली कड़ी में रेखा अनुराधा को तैयार कर रही हैं, जैसे दो सहेलियां किसी वस्त्र को बारी बारी पहनकर देख लेना चाहती हैं।
आधी रात पर चल रहा है यह गीतनुमा संवाद अब भी जारी है और रेखा कह रही हैं कि
झाँझर झमके सुन झमके आधी रात को
और उस के प्रवाह में अनुराधा कह रही हैं कि
उसको टोको न रोको, रोको न टोको, टोको न रोको, आधी रात को
इस पर रेखा हंसकर अपना सर अनुराधा के कंधे पर झुका लेती हैं मानो इसमें अपनी सहमति दर्ज करवा रही हैं।
अब अनुराधा कहती हैं कि
ओ लाज लागे रे लागे आधी रात को
इस पर रेखा इसका जवाब ढूंढ़ते हुए हाथ में सिंदूर उठा लेती हैं और कहती हैं कि
देना सिन्दूर केऊसों आधी रात को
बेला महका रे महका आधी रात को
इसके बाद दोनों इस तरन्नुम में खो जाती हैं।
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मन क्यों बहका रे बहका...
4 वर्ष पहले
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