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लागा गोरी गुजरिया....दिलीप साहब की गंभीर आंखें, अभिनय की संजीदगी तिस पर भोजपुरिया अंदाज 

लागा गोरी गुजरिया....दिलीप साहब की गंभीर आंखें, अभिनय की संजीदगी तिस पर भोजपुरिया अंदाज
                
                                                         
                            लागा गोरी गुजरिया से नेहा हमार
                                                                 
                            
होइ गवा सारा चौपट मोरा रोजगार

नैन लड़ जैंहे तो मनवा में कसक होइबे करी
प्रेम का छुटिहैं पटाखा तो धमक होइबे करी
नैन लड़ जैंहे …


खेत में काम करने वाला एक मजदूर जिसके चेहरे पर एक अनगढ़ मासूमियत तैर रही होती है, अपने दोस्तों के साथ ठेठ-देशी ठुमके के साथ 'नैन लड़ जइहैं...' की तान छेड़ता है और तब तक गाता रहता है, जब तक उसकी प्रेमिका सामने नहीं आती है। खालिस भोजपुरिया अंदाज लिए वह नौजवान मोहब्बत में फना हो जाने वाला प्रेमी है, जिंदादिल और नेक इंसान। अपनी प्रेमिका को लंपट सूदखोर साहूकार के चंगुल से बचाने की कोशिश में डाकू बन जाता है और आखिरकार पुलिस में भर्ती हो चुके अपने ही भाई की गोली का शिकार हो जाता है।  

जी हां, मैं बात कर रहा हूं भारतीय अभिनय जगत के 'ट्रेजडी किंग' कहे जाने वाले, अपनी विशिष्ट अभिनय शैली और संवाद अदायगी के लिए मशहूर हो चुके महान अभिनेता दिलीप कुमार की। जीवन के 96 सावन देख चुके दिलीप साहब ने अपनी इस लंबी यात्रा में देश और दुनिया को बहुत कुछ दिया है।  

1961 में बनी फिल्म 'गंगा जमुना' के इस गीत को लिखा था शकील बदांयुनी ने, दिलीप कुमार और वैजयंतीमाला पर फिल्माया गया था। मोहम्मद रफी की आवाज ने गीत को इतनी लंबी उम्र दी कि यह हरदिल अजीज नग़मा बन गया। 

रूप को मन मा बसैबा तो बुरा का होइहैं
कोहू से प्रीत लगैबा तो बुरा का होइहैं
प्रेम की नगरी मा कुछ हमरा भी हक़ होइबे करी
नैन लड़ जैंहे…


दिलीप साहब की गहरी और गंभीर आंखें, उनके अभिनय की संजीदगी तिस पर भोजपुरिया अंदाज और वैजयंती माला जैसी कोस्टार, उन किरदारों को ही अमर नहीं करता बल्कि प्रेम के प्रति समर्पण का भाव भी पैदा करता है। एक ख़ुशदिल, अलमस्त देहाती नौजवान का अपनी माशूका को सूदखोर साहूकार के चंगुल से छुड़ाने का हठ देखते ही बनता है। 

चौधरी जिया इमाम द्वारा लिखित और पेंगुइन प्रकाशन द्वारा प्रकाशित किताब 'नौशाद : जर्रा जो आफ़ताब बना' में नौशाद जो इस गीत के संगीतकार भी हैं, बताते हैं कि- "फिल्म के गाने के लिए दिलीप साहब ने उनसे कहा था कि गानों की जुबान आसान होनी चाहिए। नौशाद साहब ने जब इस फिल्म की भाषा बदलने का सुझाव दिया था तो साथ ही यह भी कहा था कि इस फिल्म से भोजपुरी फिल्मों का दौर शुरू हो जाएगा और ऐसा हुआ भी। इससे पहले हिंदुस्तान में भोजपुरी जुबान में कभी फिल्म नहीं बनी थी। 'गंगा जमुना' ने यह दरवाजे खोल दिए, इस फिल्म के सभी गाने सुपर-डुपर हिट हुए।''
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5 वर्ष पहले

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