कुरबतों में ये दूरियां , नज़ीर बन गयी।
मेरे तसव्वुर में , तेरी तस्वीर बन गयी।।
तन्हाई ने बख़्शी है, गुमनामी मुझको।
मेरे लिए,ये दहलीज़ लकीर बन गयी।।
ता-हद-ए-निगाह, वीराने ही वीराने हैं।
ख़्वाबों की, ये कैसी ताबीर बन गयी।।
माज़ी को जब-जब करीने से लगाया।
फिर यादों की, एक तहरीर बन गयी।।
आदतन , ये लब अब ख़ामोश हैं मेरे।
ये ख़ामोशी ही, मेरी जागीर बन गयी।।
-यूनुस खान
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
कमेंट
कमेंट X