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माज़ी को जब-जब करीने से लगाया।

                
                                                         
                            कुरबतों में ये दूरियां , नज़ीर बन गयी।
                                                                 
                            
मेरे तसव्वुर में , तेरी तस्वीर बन गयी।।

तन्हाई ने बख़्शी है, गुमनामी मुझको।
मेरे लिए,ये दहलीज़ लकीर बन गयी।।

ता-हद-ए-निगाह, वीराने ही वीराने हैं।
ख़्वाबों की, ये कैसी ताबीर बन गयी।।

माज़ी को जब-जब करीने से लगाया।
फिर यादों की, एक तहरीर बन गयी।।

आदतन , ये लब अब ख़ामोश हैं मेरे।
ये ख़ामोशी ही, मेरी जागीर बन गयी।।
-यूनुस खान
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9 घंटे पहले

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