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मेरी रूस्वाई से शहर-ओ-बाजार सजे हैं।

                
                                                         
                            मेरी रूस्वाई से शहर-ओ-बाजार सजे हैं।
                                                                 
                            
इसी मजमून के सहारे अखबार सजे हैं।।

कुछ अरसे को, केद-बाम-ओ-दर था मैं।
देखो , मेरी गुमशुदी के इश्तहार सजे हैं।।

हस्ब-ए-जरूरत,दोस्तों ने दोस्त बदले हैं।
इस फ़न से , दोस्तों के किरदार सजे हैं।।

साहिल के तमाशबीनों को,ये क्या पता।
टूटी कश्तियों से , सारे मंझधार सजे हैं।।

ख़ामोशी से मेरे दर्द का अंदाजा न कर।
देख,मेरी आहों से मेरे अशआर सजे हैं।।
-यूनुस खान
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8 घंटे पहले

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