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बागबां मिला,तो उससे मिलकर पूछूंगा मैं।

                
                                                         
                            सुरूर, रफ्ता-रफ्ता खुमार बनता जा रहा है।
                                                                 
                            
ये ताल्लुक यूं बेइख़्तियार बनता जा रहा है।।

हो सके तो, वक्त की इबारत पढ़कर देखो।
माज़ी , अब अपना प्यार बनता जा रहा है।।

किसी आमद की आहट सुने,ज़माना हुआ।
कितना वीराना, ये दयार बनता जा रहा है।।

मेरी अयादत को आये हैं, नश्तरों के साथ।
दोस्तों का,ये क्या मयार बनता जा रहा है।।

एक वो दौर था, जब ये घर, घर लगता था।
मगर,अब दर-ओ-दीवार बनता जा रहा है।।

बागबां मिला,तो उससे मिलकर पूछूंगा मैं।
क्यूं हर फूल , अब खार बनता जा रहा है।।

बात गिले-शिकवे तक रहती,तो ठीक था।
क्यूं फांसला, अब दरार बनता जा रहा है।।
-यूनुस खान
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15 घंटे पहले

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