आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

तेरे तसव्वुर से निकलना,आसान न था

                
                                                         
                            तेरे तसव्वुर से निकलना,आसान न था।
                                                                 
                            
राह में गिरकर संभलना,आसान न था।।

तुम हमसफर बने,तो बड़ा अच्छा लगा।
ताउम्र , तन्हा चलना तो आसान न था।।

तेरी आमद के इंतजार में,ये शाम ढली।
वरना यूं दिन का ढलना,आसान न था।।

अहद-ए-वफा ना लेकर, बच गये आप।
वादा करके, यूं बदलना आसान न था।।

जुगनुओं को देखा,तो जल उठे चिराग।
बुझते दियों का जलना, आसान न था।।

सावन बरसा, तो सहरा भी मचल उठा।
ऐसे तपिश का मचलना,आसान न था।।

बागबां की मेहनत , रंग लायी आखिर।
सूखे शजर का फलना, आसान न था।।

हिज़्र से फुर्सत मिली,ख़्वाब देखे हमने।
इस तरह ख़्वाब देखना,आसान न था।।

-यूनुस खान
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
4 घंटे पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर