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ये रस्ता प्यार के दर तक तेरे जाता नहीं लगता...

YE RASTA PYAAR KA DAR TERE JAATA NAHIN LAGTA
                
                                                         
                            मुझे तू भूल जाता है मुझे अच्छा नहीं लगता
                                                                 
                            
मैं रहता हूँ तेरे दिल में तुझे यह क्या नहीं लगता?

निग़ाहे लुत्फ़ तेरा है उधर रुख़ है इधर ऐसे
मुहब्बत आज़माना क्या तमाशा सा नहीं लगता?

मैं वापस आ ही जाता हूँ वहीं चलता जहाँ से हूँ
ये रस्ता प्यार का दर तक तेरे जाता नहीं लगता

तू होता है जो ग़मगीं रू मेरा भी ज़र्द होता है
फिर अपने बीच तुझको क्यूँ कोई रिश्ता नहीं लगता

घुला हो ज़ह्र कितना भी तेरी शोख़े बयानी में
मैं पी जाता हूँ हँस हँस कर मुझे तीखा नहीं लगता

रक़ीबों पर क़रम तेरा न मेरी जाँ पे आ जाए
तू मेरा है मगर अक़्सर मुझे मेरा नहीं लगता

तेरे आते ही ग़ाफ़िल बज़्म में आ जाती है रौनक़
बताना सच के तुझको क्या कभी ऐसा नहीं लगता?

-‘ग़ाफ़िल’

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8 वर्ष पहले

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