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तो जल उठते हैं कई दीये समंदर के।

                
                                                         
                            घड़ी की टिक-टिक के सिवा,
                                                                 
                            
कमरे में कोई आवाज़ नहीं।
पर इस ख़ालीपन के शोर में,
क्या कोई राज़ नहीं?
दिन भर की भाग-दौड़ के बाद,
जब शहर अपनी आँखें मूंद लेता है,
तब यह सन्नाटा ही है,
जो टूटा हुआ दिल जोड़ देता है।
यह ख़ालीपन डरावना भी लग सकता है,
अगर कान बंद हों अंदर के।
पर जब खुद से मुलाकात हो जाए,
तो जल उठते हैं कई दीये समंदर के।
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एक घंटा पहले

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