आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

बरसात अश्कों की

                
                                                         
                            मुझसे हिज्र की अब बात नहीं होती 
                                                                 
                            
ज़िंदगी में अमावस की रात नहीं होती ।

बेशक़ीमती हैं उनकी याद के मोती 
आँखों से अश्कों की बरसात नहीं होती ।

भीड़ में भी मुझको पहचान गए वो 
इससे बेहतर कोई सौग़ात नहीं होती ।

चाँद भी निकलता है तारों को साथ लेकर 
तन्हा कभी कोई बारात नहीं होती ।

मुहब्बत नहीं रहम कर रहे हैं मुझ पर 
"काज़ी" इससे बढ़कर कोई ख़ैरात नहीं होती ।


~ डॉक्टर वासिफ़ काज़ी
  इंदौर ,जिला - इंदौर
   मध्यप्रदेश
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
2 वर्ष पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर