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हमारी ज़िंदगी भा अज़ीब ज़िंदगी है जो किसी करामात से कम नहीं है

                
                                                         
                            हमारी ज़िंदगी भा अज़ीब ज़िंदगी है जो किसी करामात से कम नहीं है
                                                                 
                            
हमने समझा है ज़िन्दगी से ज़िंदगी है क्या सिर्फ़ वक्त गुजारने का नहीं है
इस ज़माने का मुआसिर वो मुआसी देखा है समाज में फ़क़त अपने लिए
जिधर निगाहें पड़ती है बेहयाई, झूठ वो मक्कारी ही नज़र आता है मुझ को
शायद मेरी आँखो में रौशनी हो तारिक_मग़र जो चमक रहा उसमें अच्छी चमक नहीं है
झूठे का बोल बाला है संसार में सच्चाई का फक़दान है क्या इसे इंसानियत कहते हैं
इसलिए कहता है भारत का दरवेश की अभी ढांचा ही इन्सान नहीं बन सका है
लोग मज़हब की बातें क्यूं करते हैं किताबें रसूल में किसी ने नहीं कहा मेरा मज़हब ये है
कोई समझें या नहीं समझें हमने सच्ची जीवन से दुनियां की आबादी का रुख समझ लिया है
ख्यालों से मेरे निकलता नहीं बचपन के ज़माने से अब तक समाया हुआ है अबतक
तौबा करो "वसी"तौबा का दर बंद होने वाली है मगफिरत की दुआ करते करते मौत क़रीब आ चुकी है

 
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18 घंटे पहले

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