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हर मन और पूरे समाज में फैल जाए।

                
                                                         
                            भारत की पुण्यभूमि में
                                                                 
                            
दीपोत्सव मनाते हैं।
आवास, निवास, घर-आँगन को
दीपों से सजाते हैं।

पकवानों की होती है भरमार,
सब मिलकर खाते और खिलाते हैं।
देव-देवियों की आराधना करके
अपने मन को निर्मल बनाते हैं।

पकवान परोसते हैं पशुओं को,
चिड़ियों को दाना देते हैं।
तम को दूर कर प्रकाश फैलाते हैं,
दीपों को प्रेम से जलाते हैं।

पर सदियाँ बीत गईं,
फिर भी मन का अँधेरा
पूरी तरह मिटा न सके।
हृदय में खिंची विभाजन की रेखाएँ
आज तक पाट न सके।

हम स्वयं ही अपने शत्रु बन बैठे,
अपनी ही इच्छाओं में उलझ गए।
मन-मुटाव और भेदभाव की आग में
अपने आप से ही दूर हो गए।

अब ऐसा नहीं होगा,
आओ, मिलकर करें यह प्रयत्न।
प्रकाश-पर्व के शुभ अवसर पर
मन में लें एक पावन प्रण।

हम शिव बाबा की संताने हैं,
ऐसी जागृति मन में लाएँ।
आओ, मिलकर दीप जलाएँ,
धरती का अंधकार मिटाएँ।

हिंदुस्तान की जय हो—
ऐसा संकल्प करें सभी।
देश के सम्मान और स्वाभिमान को
मिलकर सँजोएँ हम सभी।

प्रकाश फैले हर आँगन में,
और मन-मंदिर का तम मिट जाए।
प्रेम, सद्भाव और अपनत्व का दीप
हर हृदय में जगमगाए।

आओ, प्रेम-भाव से
मिल-बैठकर यही सोचें—
एक दीप से दूसरा दीप जले,
और उजाला घर-आँगन से बढ़कर
हर मन और पूरे समाज में फैल जाए।

 
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2 hours ago

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