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भारत की जयगाथा

                
                                                         
                            हे भारत हे जन्मभूमि, तुझे सत सत प्रणाम है,
                                                                 
                            
तेरे आन-बान-शान के लिए, हज़ारों जीवन क़ुर्बान हैं।
तू भारत, तू जम्बूद्वीप, तू सनातन की भूमि है,
तूने सींचा है मानवता को, तू धन्य, तू महान है।
तू धरती है शिव-शक्ति की, तू संस्कृति की वाहक है,
तेरे आँचल में बहती है गंगा, तू निर्मल, तू धाम है।
तू रक्षक, तू जीवनदायिनी, तू देवों की धरती है,
तेरे भीतर अनमोल ख़ज़ाने, तू धरती की शान है।
सिर हिमालय, मद्रास चरण हैं, असम-गुजरात भुजाएँ हैं,
तू भूमि है रामचंद्र की, कृष्ण की जननी तू महान है।
मुझे पता है गुज़री है तू, हज़ारों दुःख-कष्टों से,
लहू-लुहान हुई है तू, बाहर-भीतर के ग़द्दारों से।
सौगंध तेरी खाते हैं, झुकने तुझे नहीं देंगे,
मिट जाएँगे तेरे खातिर, आँच नहीं आने देंगे।

- विश्वंभर प्रसाद सती
 
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4 घंटे पहले

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