बादलों मे पानी भी न रुके तो हम कैसे रुकें,
निशाना तो बाज का भी ना चुके तो हम केसे चूके,
रात का चांद भी दिन के लिए तरसे,
देखो ये जीव पानी के लिए क्यों ना तरसे,
चाहते तो हम भी छांव में बैठे रहते,
लेकिन दिन के अंधेरे में क्या करते,
देखो ये फुल खुशबू छोड़ चले,
अब तो तारे भी साथ छोड़ चले,
बड़े तो पहाड़ भी बहुत हुए,
लेकीन चढ़ कितने सके,
आवाज़ लगाती वादियां भी कभी खो जाती है,
सुनसान रास्तों पे नंगे पांव कैसे चले,
बीन रात के चांदनी भी ना दिखे,
बीन खुशी के मुस्कान कैसे दिखे,
लहरे भी किनारे पर दम तोड़ देती है,
तो हवाओं के साथ कैसे चले,
कांटो में तो फूल भी सजे,
फिर दुख में सुख क्यों न सजे,
चोट लगने पर तो रक्त भी निकले,
फिर आंखो से आँसू क्यों न निकले,
समंदर में तो गहराइयां भी ख़त्म हो जाती है,
फिर अनंत प्रेम की आशा क्यों करे,
बादल भी कभी जमीं पर उतरे,
हमेशा उड़ने की क्यों सोचे,
परिंदे भी डाल पर आके बैठे,
हमेशा व्यस्थ रहने की क्यों सोचे,
कांटे भी कभी चुभे,
लहू में वह भी तो सजे,
देखो ये पत्तियां भी पेड़ से गिर गई,
उजाले में रोशनी भी मर गई,
बारिश भी बरसते थकी,
हवाएं भी रास्ते चली,
चमक भी चमकने से मना कर रही,
अब तो कलियां भी फूल से दग़ा कर रही,
कभी आईने को देखो तो सही,
अपने आप को बदलने की सोचो तो सही।
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