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मुझे खुद पता नहीं...

                
                                                         
                            मुझे खुद पता नहीं
                                                                 
                            

मै किधर जा रहा हूं मुझे खुद पता नहीं ,
मैं किसको चाह रहा हूं मुझे खुद पता नहीं ,

मैं मानता उसको हूं ,
वो मानती उसको है ,

मैं चाहता उसको हूं ,
वो चाहती उसको हैं ,

मैं उसके लिए रोता हूं ,
वो उसके लिए रोती हैै ,

मैं उसको खो रहा हूं ,
वो उसको खो रही हैं ,

मैं उसको पाना चाहता हूं ,
वो उसको पाना चाहती हैै ,

मेरी चाहत अधूरी रह जाएगी ,
उसकी भी चाहत अधूरी रह जाएगी ,

न मैं मुक्कमल हो पाऊंगा ,
न वो मुक्कमल हो पाएगी ,

हे इश्क मुझे खुद पता नहीं ,
मैं किधर जा रहा हूं.....
विकास मिश्रा




- हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है। 

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7 वर्ष पहले

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