सोचा, कुछ नहीं तो कम-से-कम कुछ लिख ही लेती हूँ, मन का बोझ ज़रा-सा हल्का कर लेती हूँ।
जो बीत गया, उसे ही एक बार कुरेद लेती हूँ, समय के साथ कुछ घाव भर ही लेती हूँ।
क्या हुआ जो आँखों में आज अतीत की कुछ नमी रह गई, मैं आने वाले कल को बेहतर कर ही लेती हूँ।
सोचा, कुछ नहीं तो कम-से-कम कुछ लिख ही लेती हूँ।
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