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विरह प्रेम की शायरी

                
                                                         
                            बाज़ार तो आज भी जाता हूँ
                                                                 
                            
पर उस दुकान पर तुम्हें ना पाता हूँ
जिंदगी के सफर में बहुत मिले लेकिन
प्यार सिर्फ तुम्हें ही कर पाता हूँ

आज फिर वो प्यारी मुलाकात होती
आँखों ही आँखों में बात होती
शाम तो है पर अकेला है 'मुसाफिर'
काश, तुम भी मेरे साथ होती
 
- हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है। आपकी रचनात्मकता को अमर उजाला काव्य देगा नया मुक़ाम, रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करे।
4 वर्ष पहले

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