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अनसुनी सी एक कहानी...

                
                                                         
                            अनसुनी सी एक कहानी मैं आओ तुम्हें सुनाऊं।
                                                                 
                            

जो बीता वक़्त है अपना उसकी कुछ बातें बताऊं।

तुम खुद को खोजो इसमें मैं खुद से खुद को छिपाऊं।
कल्पना रचित ख्वाबो में मैं उसको रोज बुलाऊँ।

उसके आने की धुन में पलको के फूल बिछायूँ।

आ करके पूछे मुझसे तुम कहो कहाँ मैं आऊँ।

उर के पट खोल के उसको झट से भीतर ले आऊँ।

वो मूरत सी जब बैठे मैं देख उसे हरषाऊँ।

उसकी शीतल जुल्फों में मन करे के मैं सो जाऊं।

राधा सी वो बन जाये घनश्याम सा मैं बन जाऊं ।

वो झील सी गहरी आँखेँ दिल करे डूब मैं जाऊं।

वो मधुर अधर जब खोले मिस्री सा मैं सुख पाऊँ।

वो सौंदर्य प्रेम की मूरत मेरे ख्वाबो की हकीकत।

वो राग रागिनी मेरे ,गायेे जो शाम सबेरे।

तुम मिलो कभी फुरसत से ,मैं सब कुछ तुम्हें सुनाऊं।
खुुशबू सी वो चंचल है, मधु सी मिठास है उसमेंं।

मन के जैसे पावन है,मैं क्या क्या और बतायूँ।

बस इतनी सी अपनी कहानी जिसको नित नित दोहराउँ।

कल्पना रचित ................viMal


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6 वर्ष पहले

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