नज़रों को सिर्फ़ गुस्ताख़ बताना नाजायज़ है ,
तुम्हारी तो हर अदा क़ातिलाना है।
यूँ पलकों को झुकाकर फिर मुस्कुराना,
ये भी तो इश्क़ जताने का बहाना है।
तुम्हारी ज़ुल्फ़ों का यूँ चेहरे पे बिखरना,
मेरे दिल के लिए कोई पैग़ाम पुराना है।
कभी चुपके से देखना, फिर नज़रें चुरा लेना,
तुम्हारा ये अंदाज़ भी बड़ा आशिक़ाना है।
तुम्हें क्या ख़बर तुम्हारी एक मुस्कान पर,
किसी को सारी रात नींद नहीं आना है।
तुम कहती हो कि कुछ भी नहीं तुम्हारी आँखों में,
फिर क्यों हर बार उनमें मुझे ही नज़र आना है?
नज़रों का क्या कसूर, दिल तो बहाना ढूँढता है,
तुम सामने रहो तो हर लम्हा सुहाना है।
विक्की, इश्क़ में इल्ज़ाम किसे दें आखिर,
वो हसीन है, और दिल भी तो दीवाना है।
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