वो कौन है
जो मेरे भीतर मौन है
चेतना के द्वार पर
चित्त के उस पार
है जा खड़ा
शांत सरोवर सा शीतल
मधुर धवल
निर्मल अविचल ,
किंतु अतल सिंधु सम
जो लिए वलय अनंत
डूब ही जाऊं चिंतन में
भींगू संग
सघन घन में
मन मेरा
मरुसम प्यासा है
घुल बह जाने की
अभिलाषा है
लयलीन मिलूं
उस लय में
किंतु, जो मुझमें
मेरे भीतर है
क्योंकर उससे दूर हूं मै
क्या मैने ही स्वयं
गढ़ी मूरत उसकी
है सुंदर सुघड़
छवि जिसकी
जितने भी सुवर्णमई
रंग मिलजाते
उनसे मूरत रंग देता हूं
हूं निहारता फिर जी भर
पल में सारा
जीवन जी लेता हूं
साधक भी और
याचक भी
अनुरागी ,सेवक भी मै
किंतु, जो मुझमें
मेरे भीतर है
क्योंकर उससे दूर हूं मै
-विकास मोहन गुप्ता
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