तुम मुझे प्रेम संग
पाग रही हो
मन को अपने
मेरे मन में
गूंथ रही और
बांध रही हो
तुम मुझे प्रेम संग
पाग रही हो
हो तुम मिश्री
से भी मीठी
उसपर स्नेह
तनिक सा मेरा
सौंधे सौंधे
ऊष्म मधुर्मय
बंधन में तुम
बांध रही हो
तुम मुझे प्रेम संग
पाग रही होत
अंग ,अनंग की
प्रीति से पुष्पित
विलय हुए
ऐसे आलिंगित
विवर नहीं कुछ भी
अब किंचित
सहज सरल ही
बांध रही हो
तुम मुझे प्रेम संग
पाग रही हो
- विकास मोहन गुप्ता
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