आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

प्रेम पाग

                
                                                         
                            तुम मुझे प्रेम संग
                                                                 
                            
पाग रही हो
मन को अपने
मेरे मन में
गूंथ रही और
बांध रही हो

तुम मुझे प्रेम संग
पाग रही हो

हो तुम मिश्री
से भी मीठी
उसपर स्नेह
तनिक सा मेरा
सौंधे सौंधे
ऊष्म मधुर्मय
बंधन में तुम
बांध रही हो

तुम मुझे प्रेम संग
पाग रही होत

अंग ,अनंग की
प्रीति से पुष्पित
विलय हुए
ऐसे आलिंगित
विवर नहीं कुछ भी
अब किंचित
सहज सरल ही
बांध रही हो

तुम मुझे प्रेम संग
पाग रही हो
- विकास मोहन गुप्ता
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
2 घंटे पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर