खरखटी उस खाट पर पुरवाइयाँ अच्छी लगीं।
और दरीचे पर तेरी अंगड़ाईयाँ अच्छी लगीं।
शुभ मुहूरत लाया है वो तिनका तिनका जोड़कर।
मुफलिसी में द्वार पर शाहनइयाँ अच्छी लगीं।
पीठ में खंजर मिला है जब वफ़ाओं का सिला।
इसलिए मुझको मेरी तन्हाइयाँ अच्छी लगीं।
जाने क्या कुछ सोंचकर हर सू जला डाले चिराग।
आज मुझको ख़ुद मेरी परछाइयाँ अच्छी लगीं।
-विकास कालाआमी
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