आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

पुरवाइयाँ अच्छी लगीं

                
                                                         
                            खरखटी उस खाट पर पुरवाइयाँ अच्छी लगीं।
                                                                 
                            
और दरीचे पर तेरी अंगड़ाईयाँ अच्छी लगीं।

शुभ मुहूरत लाया है वो तिनका तिनका जोड़कर।
मुफलिसी में द्वार पर शाहनइयाँ अच्छी लगीं।

पीठ में खंजर मिला है जब वफ़ाओं का सिला।
इसलिए मुझको मेरी तन्हाइयाँ अच्छी लगीं।

जाने क्या कुछ सोंचकर हर सू जला डाले चिराग।
आज मुझको ख़ुद मेरी परछाइयाँ अच्छी लगीं।
-विकास कालाआमी
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
4 घंटे पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर