शहर की रोशनी में वो बात कहाँ,
माँ के जलाए दीये की सौग़ात कहाँ।
टिकट की लाइन में खड़ा सोचता हूँ,
गाँव के आँगन-सी कोई रात कहाँ।
_विजय बिंदास राजा
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