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यादें

                
                                                         
                            क्यों रह रह कर याद आते हैं बचपन के दिन
                                                                 
                            
वुह गुज़रा समां, मेरी कोई चीज़ खो गई थी जहाँ
कोई भूली साज़ सदा बन कर
किसी खोई याद के पंखों पर
दिल-ए-गुमगश्ता मुझे ले चल वहां

यादों की ट्रैन में बैठ कर वक़्त का सफ़र
नील गगन से भी दूर सपनों का नगर
वुह पर्वतों का हमसाया एक प्यारा शहर
मेरे बचपन की गुल ज़मीं नन्ही खुशियों का मंज़र

वुह घर का चहकता आँगन
वुह लंगड़ी टांग पर लड़खड़ाना
वुह लड़ना वुह झगड़ना
राम लीला रचाना
सब से खेलना मगर
सब से नज़र बचा कर
किसी को बार बार देखना

जुगनुओं के संग तारों की रात आ गई
कोटला छुपा के जुमेरात आ गई
बचपन खेला जवानी रोली
कार-ए-जहाँ में ज़िन्दगी की शाम आ गई
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2 वर्ष पहले

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