हिकमतों की लौ
मैं नहीं कहता
नया सूरज उगाएं हम
या हथेली पर उगा दें सरसों।
पर, इतना चाहता हूँ—
कि उठाएँ पाँव हम- जब भी,
तो एक ऐसी धमक हो,
कि बिगड़ जाए
दुनिया के कदमतालों की लय।
जलाएं हिकमतों की एक लौ ऐसी
कि भूले से अगर कोई
हमें आँखें दिखाए–
तो इतनी आग दहके
हमारी आँख में,
इन हौसलों में—
कि सूरज भी ठिठककर रास्ता दे।
और, जो नजरें उठी थीं
हमारे उपहास में, अवहेलना में—
वो झुकें भी,
और बिछ जाएं
हमारी राह में —
स्वीकार में,
या हार में।
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