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एक ही हैं

                
                                                         
                            चुप और चीख एक ही है।
                                                                 
                            
चुप रहोगे,तो मर जाआेगे,
चीखे तो मरवा दिए जाओगे।

धर्म और अधर्म एक ही है।
धर्म हजारों को मारता है बेमौत ।
अधर्म से ,ज़िंदा आदमी भी
मुर्दा नज़र आता है।

सच और झूठ एक ही हैं।
सच गूंगा हो जाता है मौके पर,
झूठ सच को झूठा कर देता है।
सच बन जाता है।

अंधेरा और उजाला एक ही है।
अंधेरा पर्दा डालता है अच्छाई पर,
उजाला बुराइयों को
बेपर्द कर देता है।

आदमी और जानवर एक ही है।
भूख आदमी को गिरा देती है।
जानवर बना देती है।
पशु पेट भरने पर वार नहीं करता।
आदमी हो जाता है।

पहनना आवरण का,
न पहनना भी,
एक ही है।
शर्म आवरण है हयादार का,
वस्त्र होने पर भी बेशर्म
निर्वस्त्र नजर आता है।

आस्तिक और नास्तिक एक है।
आत्मा ही परमात्मा है।
जो कुचलता है आत्मा को
उसे परमात्मा रखना
जरूरी हो जाता है।

हर भेद
अंतत: एक हो जाता है
शून्य में समाता है।
शून्य पूर्ण है,अनादि है।
शून्य ही भव निर्माता है।

- वीणा गुप्त
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3 वर्ष पहले

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