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वो साया सर पे हो तो फिर ज़माना क्या कहे मुझको

                
                                                         
                            पापा की परी, उनकी दुआ, उनकी हँसी हूँ...
                                                                 
                            
तराशा है मुझे जिसने बड़े ही प्यार से अक्सर,
रहा जो ढाल बनकर हर कठिन से रास्ते पर।
उसी के दम से महका है मेरे बचपन का हर आँगन,
जो मेरी एक मुस्कान पर वार देता था अपना मन।
कभी कंधे पे बिठाकर दिखाया था ये जग मुझको,
सिखाया हर मुसीबत से उलझकर जीतना मुझको।
कड़ी धूप में जलता रहा पर छाँव दी मुझको,
खुद भूखा रहा, पर हर खुशी पहचान दी मुझको।
छिपाकर दर्द सीने में, हमेशा मुस्कुराता है,
पिता का प्यार ही है जो खुदा का रूप पाता है।
मैं जब रोई, तो छुप-छुपकर बहाए अश्रु उसने भी,
मेरी तक़दीर संवारने में गँवा दिए अपने लम्हे भी।
विदा होकर चली जाऊँगी एक दिन मैं पिया के घर,
मगर यादों का दीपक जला रहेगा उसके ही दर पर।
दुआ है ये कि हर जनम में वही बापू मिले मुझको,
वो साया सर पे हो तो फिर ज़माना क्या कहे मुझको
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41 minutes ago

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