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मगर पूछो उस मजदूर से, जिसका चूल्हा बुझा पड़ा है।

                
                                                         
                            फाइलों के ढेर में उलझा हुआ इंसान,
                                                                 
                            
सोचता है सुरक्षित है उसका हर अरमान।
संसद के वातानुकूलित कमरों की ठंडी छांव में,
ढूंढता है वो गरीबों की आहों के दाम।

मगर यह तो सिर्फ मन का भ्रम है भाई,
कि कागजों पर लिखी हर बात सच पाई!
चौराहों पर टांग दिए गए हैं विकास के बोर्ड,
भूखे पेट पर खींची गई हैं सीमेंट की रोड।

नेताजी कहते हैं— "देश बड़ी तेजी से बढ़ा है,"
मगर पूछो उस मजदूर से, जिसका चूल्हा बुझा पड़ा है।

यह तो सिर्फ मन का भ्रम है यार,
कि चमकते कांच के महलों में बसता है संसार!

यहाँ रोटी मांगना जैसे कोई गुनाह हो गया,
और हर हक छीनना एक अदना सा बहाना हो गया।
हम सोचते हैं कि लोकतंत्र अभी जिंदा है,
मगर सच तो यह है कि हर सच यहाँ शर्मिंदा है!

छोड़ दो अब इन झूठे सपनों का पालना,
क्योंकि सच की जमीन से कोसों दूर है छलावा।
जब तक आंखें नहीं खुलेंगी इस धोखे से,
तब तक हर नया निर्माण रहेगा बस भ्रम के भरोसे!
-विमल कुमार
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
14 घंटे पहले

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