बात जे बीतल बा ओह के उखाड़त लोग ।
ना कबो देखल जे ओह के उपाटत लोग ।
आग के बुतावल,बा काहे लोग भुलाइल ,
जात के लड़ाई,बा काहे लगावत लोग।
जहां बहा सकेला,गंगा के प्रेम धारा ,
कहीं ना काहे उहवा जहर बहावत लोग।
तनकी सा घाट-बाढ़ बर्दाश से परे बा,
नाक ध के रोई अंखियां देखावत लोग।
--'प्यासा'
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
कमेंट
कमेंट X