नारी तेरे रूप अनेक हर रूप में तू ढल जाती है,
कठोर चट्टानों को भी तोड़ती नदी तू कहलाती है।
ज्ञान विज्ञान के क्षेत्र में भी तू कमाल कर जाती है,
कोमलता के कारण पानी से भी निर्मल हो जाती है।।
श्रंगार, हास्य, रौद्र रस भी तुझमें पाया जाता है,
हर रस छंद अलंकार बस तेरे ही तो गुण गाता है।
प्रेम सद्भाव और ममत्व का गुण तुझमें पाया जाता है,
तेरा रूप सौंदर्य और कर्तव्य पथ सबको भाता है।।
कल्पना चावला, सुनीता विलियम बन विज्ञान की राह सिखाती है,
सुषमा स्वराज और द्रोपदी मुर्मू बन नारी शक्ति समझाती है।
जीवन का हर भाव तुझ बिन अधूरा हर भाव में मिल जाती है,
नारी तू नारायणी है जीवन का सार तू समझाती है।।
रक्षा क्षेत्र हो या ज्ञान विज्ञान हर जगह कमाल कर जाती है,
सभ्यता और संस्कृति को तू ही आत्मसात कर पाती है।
होते हैं अत्याचार तुझपर मगर धैर्य संयम तू दिखलाती है,
नारी नहीं नारायणी है तू मंगला काली भी कहलाती है।।
राष्ट्र रक्षा हित लक्ष्मी,बाई धर्म रक्षा हित कर्णवती बन जाती है,
कभी सीता कभी सावित्री कभी अनुसूया तू बन जाती है।
अपनी तपस्या के कारण त्रिदेव को छोटा बच्चा तू बनाती है,
अपने ममत्व के कारण ही सबसे महान तू हे मां कहलाती है।।
-चन्द्र शेखर मार्कंडेय
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
कमेंट
कमेंट X