विष और मनुष्य
हर मनुष्य के जीवन में
कभी न कभी
विष का एक घूँट
अवश्य आता है।
पर प्रश्न यह नहीं
कि विष मिला या नहीं;
प्रश्न यह है
कि हम उसका
क्या करते हैं।
समुद्र-मंथन के समय
क्षीरसागर से
जब हलाहल निकला,
कोई भी देवता
उसे ग्रहण करने का
साहस न कर सका।
तब महादेव ने
उस विष को स्वीकार किया,
पर उसे हृदय तक
उतरने नहीं दिया।
इसीलिए वे
नीलकंठ कहलाए।
एक विष मीरा ने भी पिया।
उन्होंने उसे
प्रभु का प्रसाद समझकर
श्रद्धा से ग्रहण किया।
विश्वास इतना प्रबल था
कि विष भी
अमृत-सा प्रतीत हुआ।
हम सबके जीवन में भी
ऐसे अनेक विष
बार-बार आते हैं—
अपमान, विश्वासघात,
वियोग, असफलता,
पीड़ा और संघर्ष
के रूप में।
किन्तु निर्णय हमारा होता है—
क्या उन्हें
अपने मन में फैलाकर
जीवन को विषाक्त कर दें,
या शिव की तरह
उन्हें सीमित रखकर
आत्मबल में बदल दें।
यदि हम
मीरा-सा विश्वास रखें
और शिव-सा धैर्य,
तो हर विष
एक नई शक्ति बन सकता है।
तब पीड़ा
पराजय नहीं रहती,
वह तप बन जाती है;
संघर्ष बोझ नहीं रहता,
वह साधना बन जाता है।
जीवन का यही सत्य है—
विष बाहर से आता है,
पर अमृत
हमारे भीतर जन्म लेता है।
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