ये कैसी वहशत है कि दिल को सुकूँ नहीं मिलता
भीड़ में भी कोई अपना सा जुनूँ नहीं मिलता।
रात उतरती है तो ख़ामोशी चीख़ उठती है,
इस दिल को अपने ही अंदर कोई मकाँ नहीं मिलता।
हर तरफ़ लोग हैं, आवाज़ें हैं, रिश्ते हैं मगर,
मेरी तन्हाई को कोई हमनवा नहीं मिलता।
जिसे खोया है, वही हर तरफ़ नज़र आता है,
उसके बिन आँखों को कोई मंज़र हसीं नहीं मिलता।
कभी यादें रुलाती हैं कभी ख़ामोशी डसती है,
इस वहशत को मगर कोई किनारा नहीं मिलता।
मैं अपने ज़ख़्म छुपाकर मुस्कुराता रहता हूँ,
मगर रूह को इस दर्द से छुटकारा नहीं मिलता।
सजदों में रख दिया है मैंने अपना सारा दर्द,
फिर भी दिल को दुआ का जवाब जल्दी नहीं मिलता।
किसी की कमी ने ऐसा वीरान किया है मुझे,
अब अपने ही साए में अपना पता नहीं मिलता।
कभी लगता है मैं ख़ुद से ही बिछड़ गया हूँ,
कभी लगता है मुझे मेरा ही चेहरा नहीं मिलता।
ये कैसी वहशत है तेरी जुदाई की मेरे मौला,
रोना चाहूँ तो आँसू, हँसू तो चेहरा नहीं मिलता।
शायद यही इश्क़ की आख़िरी सज़ा है
इंसान ज़िंदा रहता है
मगर उसके अंदर जीने का रास्ता नहीं मिलता।
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