लबों पे मुस्कान थी, आँखों में इक कहानी रही,
दिल में हर दर्द की उम्र भर इक निशानी रही।
राह में धूप थी, पाँव में छाले भी मिलते रहे,
फिर भी मंज़िल की चाहत में अपनी रवानी रही।
कुछ मिले राह में, कुछ बिछड़ते चले ही गए,
दिल में हर एक की याद बनकर पुरानी रही।
वक़्त ने छीन लीं ख़्वाब की कितनी परछाइयाँ,
दिल में उम्मीद की फिर भी इक मेहरबानी रही।
जिसको अपना कहा, वो मुक़द्दर में आया नहीं,
फिर भी उस नाम से दिल की इक ख़ुशगुमानी रही।
उम्र चेहरे पे लिखती रही वक़्त के सब निशाँ,
दिल के इक कोने में फिर भी थोड़ी नादानी रही।
वक़्त बदला, शहर बदले, कई हमसफ़र भी गए,
दिल में यादों की दरिया-सी बहती रवानी रही।
आख़िरी मोड़ पर जब पलटकर सफ़र को पढ़ा,
जो मिला वो कहानी, जो खोया निशानी रही।
— संतोष कुमार शर्मा
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
कमेंट
कमेंट X