आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

प्रकृति कासाथ

                
                                                         
                            प्रकृति का साथ, सिलसिला होना बहुत ज़रूरी,
                                                                 
                            
वरना सेहत की राह हो जाती है कुछ अधूरी।

सूरज की किरणों का तन से स्पर्श हो इनायत,
खुली हवा, पेड़ पत्तों का साथ बने इबादत।

मिट्टी को छूने, सहलाने का सुख है अनूठा,
माटी से जुड़कर ही जीवन लगता है पूरा।

नदी सागर के किनारे जाकर देखो नज़ारे,
शीतल हवा और जल के स्पर्श लगें कितने प्यारे।

दौलत के बेमानी फसानों में मगरूर न होना,
कृत्रिम सुख सुविधाओं में खुद को कैद न करना।

दवाओं के सहारे ही जीवन न गुज़ारा कीजिए,
प्रकृति की गोद में भी कुछ पल गुज़ारा कीजिए।

हरी घास, फूल, पवन और नदियों का साथ,
तन को दें ताज़गी, मन को दें नई सौगात।

प्रकृति से जो जुड़ा, वह जीवन से जुड़ जाता है,
माटी का स्पर्श मन में नवजीवन भर जाता है।

 
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
एक घंटा पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर