"दिल्ली में नहीं पढ़ना...
नहीं, बेटी को दिल्ली नहीं भेजूँगी!"
ये कैसी सोच है?
अघटन तो कहीं भी घट सकते हैं
इतनी भी बुरी नहीं है दिल्ली
दरिंदे सिर्फ जंगल में होंगे...
कहाँ लिखा है ऐसा?
आईपीसी (IPC) से बीएनएस (BNS) तक...
सब मौन हैं!
शक्ति मिल्स याद है, मुंबई वाला?
उन्नाव, हाथरस...
किसने कहा सिर्फ छात्राओं को खतरा है?
तुम क्यों इतना घबराती हो!
आरजी कर, कोलकाता भूल गईं?
डॉक्टर थी वो
हैदराबाद वाली पशु चिकित्सक...
कठुआ में तो वह सिर्फ आठ साल की थी,
और राणाघाट में इकहत्तर साल की नन!
उनके कपड़े 'उत्तेजक' तो नहीं थे न?
जानवर घर-घर में हैं,
माताएँ 'शेर' पैदा करती हैं,
और वो शिकारी 'भेड़िए' बन जाते हैं
पेपर स्प्रे ईजाद यूँही तो नहीं हुआ
अब नुकीले, धारदार नाखून चाहिए...
नेल आर्ट नहीं!
नेल डार्ट चाहिए!
रात में झुंडों में निकला करो
तुम भी शिकार करने
इस जंगल में...
ओ दुर्गाओं! ओ कालियों!
—राजेश शर्मा “राज”
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