मेरी माँ
मेरी माँ…
सिर्फ़ एक शब्द नहीं,
पूरा संसार है;
उसकी ममता में
जीवन का हर आधार है।
मेरी माँ—
सुंदर, सुशील और आत्मनिर्भर,
दो रोटी के साथ-साथ
जीवन की सीखें दे जाती।
वह सीख आज भी
जीवन की कठिन राहों को
सुगम बनाती।
मेरी माँ—
हर पल, हर क्षण
मुझे अपने जैसा बनाती।
मैं उसकी ही परछाईं हूँ,
यह सोचकर
मन ही मन इतराती।
मेरी माँ—
घर हो या बाहर,
हर जिम्मेदारी निभाती;
दूसरों की कमियाँ नहीं,
अपने भीतर की खूबियाँ
हर दिन निखारती।
मेरी माँ—
उस वृक्ष की शीतल छाया है,
जो तपती धूप में भी
सुकून दे जाती है।
वृक्ष जब हरा-भरा हो,
तो उसकी हर टहनी
लहलहा उठती है।
और मैं…
उसी वृक्ष की एक टहनी हूँ,
जो आँधियों और बारिशों में भी
अपना हरा रंग नहीं खोती;
झुकती हूँ, टूटती नहीं,
और हर मौसम में
जीना सीखती हूँ।
मेरी माँ…
मेरी ताकत,
मेरी पहचान है।
उसके संस्कारों से ही
मेरे जीवन की
एक अलग उड़ान है।
माँ…
तुम केवल मेरा अतीत नहीं,
मेरे वर्तमान की शक्ति
और भविष्य का विश्वास हो।
तुम हो तो
मेरी हर राह में
जीवन का उजास है।
-नीरजा वकील
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