मन नहीं माना,
उसके एहसास को इस तरह
अपने साथ जीता देखकर,
वाकई मन हिलकोरे लेने लगा,
उसे बार-बार याद करने लगा।
मैं अकिंचन ही अपनी
उस छोटी-सी चेतना को
खो बैठा,
जब मुझे ज्ञात हुआ
कि यह तो केवल भ्रम मात्र था।
यह खुशी तो क्षणिक थी,
जो लहरों की तरह आगे बढ़ी,
आकर पाँव छूकर
पुनः उसी धार में
विलीन होती चली गई।
पर मन नहीं माना,
उसने यह भी नहीं जाना
कि मुझे कितनी यातनाएँ
सहनी पड़ सकती हैं।
वह गुलाब पाने की चाह में
शूलों की पीड़ा
भूल बैठा।
उस प्रणय, उस आमोद-प्रमोद
की चेष्टा को तो वह
सदियों से भूल बैठा है,
जैसे न जाने कितने वर्षों से
वह यूँ ही बेजान वृक्ष की
सूखी टहनियों की भाँति
अपने ही जलने की प्रतीक्षा कर रहा हो।
अंततः एक दिन
वह स्वयं राख बन गया,
और उसी मिट्टी में विलीन होकर
एक जीवित वृक्ष का पुष्प बना—
लाल, चटक रंगों वाला,
गुलमोहर का पुष्प।
लेकिन मन नहीं माना।
अब वह
गुलाब बनना चाहता है।
— विशाल शर्मा ‘निर्भय’
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
कमेंट
कमेंट X