मैं नदी हूँ
मैं नदी हूँ—
नुकीले कंकड़-पत्थर भी
नहीं रोक पाते मेरा पथ;
अठखेलियाँ करती हुई
अपनी राह बना लेती हूँ।
हाँ, मैं नदी हूँ—
कुछ नादान लोग
मेरी धारा में मैल घोल देते हैं,
पर मैं हर उफान के साथ
उसे किनारों तक बहा ले जाती हूँ।
क्योंकि मैं नदी हूँ—
मेरा लक्ष्य केवल बहना नहीं,
सागर से मिलना है;
हर बाधा को पार करते हुए
निर्मल बने रहना है।
मैं नदी हूँ—
मेरा अपना एक संगीत है,
अपनी एक लय,
अपनी एक पहचान।
मैं रुकना नहीं जानती।
यही मेरा सत्य है—
चलते रहना ही मेरा धर्म है,
देते रहना ही मेरा स्वभाव,
और बहते रहना ही
मेरे अस्तित्व का उत्सव।
मैं नदी हूँ—
अनवरत, अविरल,
जीवन की तरह।
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