छोटे पत्तों की ताज बनाकर,
धोती की लंगोट लगाकर।
हाथों में पकड़े तलवार,
बाहर आया नन्हा कुमार।
देखो अम्मा! देखो अम्मा!
मैं भी बन गया राजकुमार।
बना माथे पर कुमकुम की रेखा,
छोटी कुर्सी पर वो बैठा।
बोला अम्मा!
अब ना हूँ मैं तेरा लाल,
मैं तो हूँ यहाँ का राजकुमार।
मैं भी अब राजमहल में जाऊँ,
खीर-बताशा मैं भी खाँऊं।
पहनूँ मैं भी नई पोशाक,
खेलूँ नए खिलौनों के साथ।
सोऊँ मखमल के बिस्तर पर,
भूलूँ मैं दुनिया की बात।
माँ, अब मैं भी बन गया राजकुमार।
हँसकर बोली अम्मा प्यारी,
कर ले तू जितना श्रृंगार।
तू तो है मेरा नन्हा कुमार।
समझाती हुई अम्मा बोली—
ना कोई बनता ऐसे राजकुमार।
वे होते राजा के सुकुमार,
जो रहते महलों की वादी में,
लेते पकवानों का स्वाद।
सोते मखमल के बिस्तर पर,
ना जाने सुख-दुख का सार।
कुमार में जब जगा कौतूहल—
क्या नहीं है अम्मा इसका कोई हल?
क्या ना मैं बन सकता राजकुमार?
क्या मैं हूँ केवल तेरा कुमार?
हँसती हुई अम्मा बोली—
हर मुश्किल का होता है हल।
मिलकर पूरे करेंगे हम सब,
तेरे इन सपनों का कल।
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राजकुमार तू है हम सबका,
भले सीमित है इसकी रेखा।
खीर-बताशा तू भी खाए,
केवल है प्याली का अंतर।
सोए तू भी बिस्तर पर,
बस है मखमल-गद्दे का अंतर।
ढेरों खिलौनों से तू भी खेले,
बस है माटी-सोने का अंतर।
पहने तू भी नई पोशाक,
बस है रेशमी सूतों का अंतर।
अंतर चाहे जो हो जाए,
तू तो है हम सबका राजकुमार!
सुन अम्मा की प्यारी बातें,
खुश हो गया नन्हा कुमार।
भले वो ना हो राजमहल में,
फिर भी बन गया राजकुमार।
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