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माफी कुबूल कीजिए

                
                                                         
                            नज़रें झुकाए बैठना यूं, अच्छा नहीं लगता,
                                                                 
                            
ये चुप का साया दरमियां, सच्चा नहीं लगता।

माना कि मुझसे ही कहीं कुछ भूल हो गई,
जो बात चुभ गई तुम्हें, वो शूल हो गई।

पर रूठने का सिलसिला अब खत्म भी करो,
दिल की अदालत में ज़रा कुछ रहम भी करो।

ये घर, ये रास्ते, ये शाम सब वीरान हैं,
तेरी हंसी के बिन मेरे जज़्बात हैरान हैं।

तुम रूठती हो तो थमी सी सांस लगती है,
हर एक खुशी भी बेअसर, उदास लगती है।

शिकवे गिले जो भी हों, सब खुलकर सुना भी दो,
चाहे सज़ा दे दो मुझे, बस मुस्कुरा भी दो।

तुम्हारे साथ से ही तो ये ज़िंदगानी है,
हमारी हर सुबह की तुम ही तो कहानी हो।

हाथों में हाथ थाम लो, अब छोड़ दो ये तकरार,
माफी कुबूल कीजिए, और बांटिए वो प्यार।
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एक दिन पहले

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