आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

कायरों की भांति सहना अब ना हमको स्वीकार है

                
                                                         
                            कायरों की भांति सहना, अब ना हमको स्वीकार है
                                                                 
                            
मौन का यह वक्त बीता, अब तो केवल हुंकार है।
पर्वतों की छातियों को चीरना हम जानते
हम ना किस्मत के लिखे को अंतिम सत्य मानते।

जब उठेगी मुठ्ठिया , तो आसमां झुक जाएगा
कौन सा ऐसा समंदर , जो राह हमारी रोकेगा।
हम वो अंगारों के बेटे हैं, जो राख में जीवित हुए
विष पिया जिसने स्वयं, वह आज भी तो शिव हुए।

फेंक दो भय की यह केंचुल, ओज का श्रृंगार करो
सामने जो विध्न आए , उस पर सीधा प्रहार करो।
रोक लो बहती हवा को , या दिशा मोड़ दो गगन की
जीत कर ही अब थमेंगी, धड़कनें इस वतन की।

मिट गए जो राह में,वो इतिहास बन के गाए जाएंगे
हम वह सूरज हैं जो ढल कर , फिर से उग कर आएंगे।।

- राकेश कुमार तिवारी 
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
7 घंटे पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर