कायरों की भांति सहना, अब ना हमको स्वीकार है
मौन का यह वक्त बीता, अब तो केवल हुंकार है।
पर्वतों की छातियों को चीरना हम जानते
हम ना किस्मत के लिखे को अंतिम सत्य मानते।
जब उठेगी मुठ्ठिया , तो आसमां झुक जाएगा
कौन सा ऐसा समंदर , जो राह हमारी रोकेगा।
हम वो अंगारों के बेटे हैं, जो राख में जीवित हुए
विष पिया जिसने स्वयं, वह आज भी तो शिव हुए।
फेंक दो भय की यह केंचुल, ओज का श्रृंगार करो
सामने जो विध्न आए , उस पर सीधा प्रहार करो।
रोक लो बहती हवा को , या दिशा मोड़ दो गगन की
जीत कर ही अब थमेंगी, धड़कनें इस वतन की।
मिट गए जो राह में,वो इतिहास बन के गाए जाएंगे
हम वह सूरज हैं जो ढल कर , फिर से उग कर आएंगे।।
- राकेश कुमार तिवारी
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