धनुष हाथ में थामा,
कौशल जग को दिखाया।
नाम पूछा जब सबने,
सूतपुत्र कहलाया।
प्रतिभा थी यदि मेरी,
क्यों अवसर ठुकराया?
जन्म बड़ा या कर्म बड़ा,
कर्ण पूछता आया।
गुरु पाने की चाहत,
मन में दीप जलाया।
ज्ञान मिला भी लेकिन,
मूल्य बहुत चुकाया।
सीख अगर सबकी थी,
क्यों मुझसे छिपाया?
जन्म बड़ा या कर्म बड़ा,
कर्ण पूछता आया।
रंगभूमि में उतरा,
अर्जुन सामने आया।
कौशल जब टकराया,
वंश बीच में आया।
शौर्य अगर पैमाना था,
क्यों कुल आड़े आया?
जन्म बड़ा या कर्म बड़ा,
कर्ण पूछता आया।
मित्र मिला दुर्योधन,
उसने मान दिलाया।
जिसने हाथ बढ़ाया,
साथ उसी का निभाया।
ऋण था या मजबूरी,
जीवन भर चुकाया?
जन्म बड़ा या कर्म बड़ा,
कर्ण पूछता आया।
माँ जब मिलने आई,
सच भी साथ में लाई।
जन्म दिया था ऊँचा,
पहचान क्यों छिपाई?
सच यदि पहले मिलता,
क्या राह बदल न पाई?
जन्म बड़ा या कर्म बड़ा,
कर्ण की पीर समाई।
आज भी कितने कर्ण,
ठोकर रोज़ हैं खाते।
योग्यता हाथों में,
अवसर फिर भी जाते।
काबिल होकर भी क्यों,
पीछे वे रह जाते?
कर्म बड़ा तो फिर क्यों,
नाम बीच में आते?
जाति, कुल और परिचय,
कब तक राह बनाएँ?
प्रतिभा पीछे छूटे,
कम योग्य बढ़ जाएँ।
अवसर यदि सम हों,
कितने कर्ण उभर जाएँ।
जन्म नहीं, बस कर्म से,
हम पहचान बनाएँ।
कर्ण गया रणभूमि से,
प्रश्न मगर रह जाता।
प्रतिभा को अवसर मिले,
देश स्वयं बढ़ जाता।
हर क्षमता को मंच मिले,
नव इतिहास बन जाता।
जिस दिन अवसर सम होंगे,
कर्ण प्रश्न मिट जाता।
— संतोष कुमार शर्मा
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