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कब आओगे

                
                                                         
                            वादे झूठे कर गये,कसम सभी दी तोड़।
                                                                 
                            
पिया बसे परदेस में,मुझे अकेला छोड़।।

छलिया ने ऐसा छला,तोड़ गया विश्वास।
टुकड़े-टुकड़े दिल हुआ,सुख की छूटी आस।।

बिन बादल बरसात सम,झर-झर बरसे नैन।
होठों पर चुप है लगी,भूल गई सब बैन।।

भूख मरी निद्रा उड़ी,लिया चैन भी छीन।
विरहन तड़पे इस तरह,जल बिन जैसे मीन।।

प्राण निकलने की घड़ी,निकट खड़ी है आज।
निष्ठुर आ कर देख ले, बची रहे यदि लाज।।
-दीप्ति अग्रवाल 'दीप'
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एक घंटा पहले

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